भी संबोधन न करें- इसमें उस समाचार-पत्र अथवा व्यक्ति विशेश का दोश नहीं है- मेरे विचार से इससे इसी का निदर्शन होता है कि परतंत्र राश्ट्रों की कैसी दुगर्ति बनी है, वहां मानवता भी कितनी महंगी है!
बलिदानी वीर या अधम
कोठारी के द्वार की सलाखों से कोई झांक रहा था, ’’क्यों, कैसे हो बैरिस्टर, ठीक हो न!’’
’’हां, आपके आर्शीवाद से ठीक हूं।’’ मैंने कहा।
’’ना-ना, महाराज, कहां आप, कहां हम! क्ल ही यूरोप से आए अपने एक मित्र से मेरा संभाशण हुआ। उसने बताया,’सारे यूरोप में सावरकर को एक हुतात्मा जैसा सम्मान मिल रहा है। फ्रांस, जर्मनी आदि देशों के समाचार-पत्र आपकी तुलना बुल्फटोन-एमेट-मैजिनी के साथ कर रहे हैं ं ं ं । वे सज्जन आपसे मिलना चाहते थे परंतु मैंने उन्हें बताया कि यह असंभव है। परंतु कम-से-कम आपके दर्शन का तो लाभ हो- इस तीव्रतर इच्छा से वे
हवलदार आादि लोग चले गए। पुनः मैं और मेरा दंड दोनों आमने सामने एक दूसरे से परिचित होने के लिए खड़े रहे।
यह परिचय पूरा होता गया। अब कोई संदेह शेश नहीं रहा। आशा नहीं थी,
तथापि यह संभावना थी - कदाचित् हेग के निर्णय से मुक्ति संभव हो- पर अब वह समाप्त हो गई। अब यह निश्चित है कि संपूर्ण जीवन इसी तरह की किसी कोठरी में सड़ता रहेगा। तो फिर? इसका भी सामना करना होगा, और क्या?
वही होगा जो प्रतिकूल है
मेरे इस कश्टमय हेतुपूर्वक