जिस टुकड़े में मैंने यह वृत्तांत पढ़ा था, उसी में केसरीवालों ने एक-दो टिप्पणीं लिखकर सर हेनरी साहब का बचाव करने का प्रयास किया था। ’केसरी’ के लेख में मेरा नामनिर्देश एकवचनी संबोधन से किया हुआ देखकर मुझे मन-ही-मन आश्चर्य हुआ। ’सर साहब, यह सावरकर कौन? काला या गोरा, यह भी नहीं जानते।’ ऐसा वाक्य सर हेनरी काॅटन के समर्थन में लिखा था। ’केसरी’ सरीखे पत्र को भी उस परिस्थिति में यह लिखना पड़ा। परंतु उस समय अपना निरपराधत्व तथा शिश्टतव प्रस्थापित करने के लिए किसी भी राजनीतिक संस्था अथवा व्यक्ति के लिए सावरकर को घोर अपराधी कहना और उस नाम का अशिश्टता से एकवचनी (तू-तड़ाक) उपपदों से उल्लेख करना एक अमोघ साधन बन गया था। इंग्लैंड में एक अंग्रेज अधिकारी हमारा गौरवपूर्वक उल्लेख करे और इधर हिंदुस्थान में हमें ’तू-तड़ाक’ के बिना बडे़ साहसी समाचार-पत्र
भी कभी इधर रहे क्या?’’ कोठरी में थे। एक दिन खटमलों ने उनका लहू चूस चूसकर रात भर उनकी नींद हराम कर दी। मैंने सवेरे द्वार खोला, देखा तो तिलक खटमलों का शिकार करने में व्यस्त हैं। मैंने पूछा, ’क्यों महाराज, ठीक तो हैं न आप! ’वे श्शांति के साथ मुस्कुराते हुए बोले, ’ठीक तो हूं जमादार, केवल कल रात भर आंख नहीं लगी। तनिक भीतर तो आइए, देखिए आपके ये पालतू कीड़े।’ मैंने देखा, तो खटमलों की पंक्तियां भीत पर जा रही थी। ’परंतु तात्या साहब, यह जो राजनीतिक कार्य आपने हाथ में लिया है, वह सफल होगा क्या?’’