जीवन मात्र पच्चीस वर्ष की आयु में ही इस प्रकार नश्ट हो रहा है। उन्होंने यह आशा भी व्यक्त की थी कि कम-से-कम हेग का उच्चतम न्यायलय मत-स्वतंत्रता के अधिकारों को न कुचलकर मुझे फ्रांस वापस भेजने का निर्णय करेगा। सर हेनरी साहब के इस भाशण से ही संपूर्ण अंगे्रजी समाज बौखला गया। सावरकर के लिए सहानुभूति का प्रदर्शन! भले ही वह निंदागर्भित क्यों न हो, लेकिन थी तो सहानुभूति ही। किसी ने कहा, इस हेनरी काॅटन की ’सर’ के काॅटन श्शब्द के आधार पर सावरकर ने यह उत्कृश्ट व्यंग्य रचना की है- काॅटन माने कपास, सरकी माने बिनौला- अर्थात् काॅटन का बिनौला निकाल डालो। किसी ने कहा, उसकी पंेशन बंद करो। आखिर चाय की प्याली के इस तूफान के झोंके के साथ ही राश्ट्रीय सभा का सावरकर तथा उनके अनगामियों के पथ से किसी प्रकार का संबंध तो दूर, रत्ती भर सहानुभूति भी नहीं है। ’केसरी’ के
कहा,’ठहरो जरा और देखते जाओ मैंने इन खटमलों के लिए एक रामबाण औशधि ढूंढ निकाली है। आपको भी देता हूं।’’ चंद घंटों में खोल तैयार हो गई और देखते देखते वह बामन उसमें घुस गया, जैसे तानकर सोए तो तब उठे जब हमने ही सवेरे दरवाजा खटखटखाया। तब से मजाल है कि एक खटमल ने कभी उन्हें सताया हो। दिन में उस थैली को उलटी करके वे उसे धूप में रखते और रात में उसमें घुसकर खर्राटे भरते।’’
’’तिलक, आगरकर के साथ वे यहां थे, उसके बाद