जिससे दम घुटने लगता। ऐसा लगता, अपने पीछे अपने कार्य का क्या होगा ं ं ं ंयदि ं ं ं फिर ये कश्ट भी ं ं ं ंपरंतु मन का संतुलन फिर से संभालना।

सर हेनरी काॅटन

एक दिन जेल में यह हल्ला हुआ कि मेरे कारण किसी बड़े साहब की पंेशन बंद की गई है। यह क्या प्रकरण है? कुछ दिन पश्चात् ’केसरी’ का एक टुकड़ा अचानक


काल कोठरी में मेरे हाथ लग गया। उसके द्वारा इस वार्त्ता का तथ्य थोड़ा समझ में आया। लंदन में नूतन वर्ष के उपलक्ष्य में वहां के भारतीय लोगों द्वारा एक गोश्ठी आयोजित की गई थी। उस समय सभा की भित्तिा पर मेरी एक बड़ी सी तस्वीर लगाई गई थी। गोश्ठी के प्रधान अतिथि सर हेनरी काॅटन जैसे जाने माने सज्जन ने मेरी तस्वीर को संबोधित करते हुए साहस, देशभक्ति की अत्युत्कटता आादि कुछ गणों की प्रशंसा की थी और इसके लिए खेद भी व्यक्त किया था कि ऐसे गुणसंपन्न नवयुवक का


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पर फिर धीमी आवाज में बतियाने लगते अथवा चुप हो जाते। और वे वाई के पत्रकार-हां-हां, वही जो आप कह रहे हैं- वृद्व लेले- जो कुबड़े थे, वे भी यहीं पर साधारण बंदी थे। उनकी बुद्वि बड़ी कल्पनाशील थी। इधर खटमलों की भरमार हो गई थी। लेले बहुत झुंझलाते। वस्त्र मिलते, उन्होंने उनमें से एक महीन परंतु सघन चादर निकाली और वे उसकी, जैसे तकिये की बनाते हैं, आच्छादन की खोल सीने लगे। हमने यूं ही पूछा,’ष्शास्त्रीजी, यह क्या सिलाई कर रहे हैं? साहब बिगड़ेगा।’ उन्होंने


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