था। इसबात का मुझे स्मरण नहीं कि हेग के निर्णय के पश्चात् डोंगरी के बंदीगृह में मैं कितने दिन पड़ा रहा। प्रातःकाल उठना, व्यायाम के लिए टहलते हुए मुखोद्गत योगसूत्रों का पाठ करना, उनमें से अनुक्रम से प्रत्येक पर विचार करना, फिर कठोर परिश्रम के तौर पर जो कठोर काम मिले वह करना, उसे करते करते ही मन में दस-बारह नई कविताओं की रचना और पुरानी कंठस्थ कविताओं की आवृत्तिा के पश्चात् भोजन करना। भोजन से निपटकर जेल बंद होने के बाद सर्वत्र श्शांति छा जाने पर ध्यान धारणा का अभ्यास करना, उसके पश्चात् रात नौ बजे तक सो जाना। नींद बहुत गाढ़ी जा जाती। एकांत कोठरी में इस तरह का कार्यøम चलता। कभी कभी ’प्रवृत्तिाचिये राजबिंदीं। पुढां बोधचिये प्रतिपदीं। विवेक दृश्यांची मांदी सारीत’¹ - इस प्रकार विवेक दृश्यों के झुंड दूर करने का प्रयास करते हुए भी चिंता तथा उद्वेग अचानक धर दबोचते,
कूटने लगा। हवलदार और वह बंदी यह देखने वहीं खड़े रहे कि मैं यह काम कर सकता हूं या नहीं, और मेरा मन बहलाने के लिए वे इधर उधर की गप्पें हांकने लगे-
‘‘महाराज, आपको यह ज्ञात नहीं होगा, जब तिलक¹ और आगरकर को दंड हुआ था जब उन्हें इसी कोठरी में रखा गया था। वे जब आपस में बहस करते तब जोर जोर से बोलने लगते। तब कभी कभी उन्हें चेतावनी देनी पड़ती कि धीरे बोलो।’’
’’पर वे आपकी बात सुनते थे या उलटे आप पर ही तनिक झुंझलाते,