कुदरत ने ही लटका दिया है, ताकि उसे बजाकर वह अपना यथासंभव मनोरंजन कर सके। बाज ने निशाना लगाते ही विवश हो उसकी चांेच के अंदर ही फंसा हुआ पंछी- सहायता की लेशमात्र आशा न होते हुए भी- जो स्वाभाविक चीख् निकालता है, उस चीख से लेकर, नेपोलियन का श्शव सेंट हेलिना से पेरिस जिसे दिन लाया गया, उस दिन एक पूरा-का-पूरा राश्ट्र अपने ध्वजों को झुकाए, अपने हजारों वाद्यों से हजारों शोक -स्वर तथा विरह गीतों को गाते हुए दुःख और आक्रोश का जो प्रकटीकरण कर रहा था-उस आक्रोश तक, उस राश्ट्रीय स्ुूर्तिगान तक, जितना भी प्राणिसृश्टि का आक्रोश है, उतना सब अपने-अपने दुःख को सर्वज्ञात करने में मग्न होता है। आक्रोश दुःख का स्वभाव ही है, सो इस अनंत अंतराल में जो अनंत चीखें अपने-अपने दुःख का बोझ हलका करती हुई विचरण कर रही है, उनके मध्य मेरा दुःख भी अभिव्यक्ति का सांस क्यों न


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लगता था, हमें जो यातनाएं भुगतनी पड़ीं उन यातनाओं को भुगतते-भुगतते जो लोग उन यातनाओं के शिकार हो गए, उनको तो घर लौटकर प्रियजनों को अपने वे सुख-दुःख बताने का भी संतोश नहीं प्राप्त हुआ। वे साथी आज हमारे बीच नहीं हैं, जिनके साथ तप की जलन को सह लिया था, उनको छोड़कर समारोह की दावत के पकवान अकेले ही कैसे खाएं? क्या यह उनके साथ प्रताड़ना नहीं होगी?

और हम जैसे कतिपय मनुश्यों पर आज तक ऐसे विकट संकटों का सामना करनेवाले आह्नान आ गिरे हैं


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