करते समय जिनका संपूर्ण पराभव हो गया है, जिनके माता-पिता, पत्नी-पुत्रए पूरे परिवार का सर्वनाश हो गया है, जिनके शिश्यों ने उनके प्रति श्शपथपूर्वक उठाई निश्ठा उन्हीं के सिर फोड़ा, फिर भी इस नरकेसरी ने दुःख का हलाहल किसी अपयश का रूद्र सरीखा अवतार धारण कर पचा लिया। गोविंदसिंहजी का यही अपयश आज मेरे भयंकर दुःख तथा पराजय का मेरूदंडवत् आधार बनेगा। यही मेरी पीढ़ी के अपयश, दुःख और पराजय की गहरी नींव पर भावी पीढ़ियों के यशप्रासाद खड़े करेगा।

भावनाओं के मीनार पर आरूढ़ होकर मेरा मन सुदूर दृश्य देखने में तल्लीन हो रहा था-और मेरे हाथ नारियल की मोटी-मोटी जटाएं तोड़ने, कूटने में, उन्हें सुलझाने में व्यस्त थे। प्रतिदिन के लिए निश्चित दस-पंद्रह आर्या (मराठी छंद) बन चुकी थाी-जटाएं सुलझाना भी समाप्त हो चुका। हाथ छिल गए थे, छाले पड़ गए थे, जिनसे लहू रिसने लगा


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के किसी पुच्छल तारे से टकराने भर की देरी है कि पुनः तेजोमेध-सभी निरर्थक! डसी प्रकार उसी का और उसी के एक आवश्यक एवं अपरिहार्य अटल हिस्से के रूप में बनी-बनाई बंधी हुई रस्सी खोलकर उसे कूटना-यह है हमारा पिश्टपेशण। यदि वह महान पिश्टपेशण महत्तवपूर्ण हो, कुछ असहमति रखता हो, यदि उसमें जीवन निरर्थक न हो, तो यह भी एक छोटा सा पिश्टपेशण कर्तव्य ही है, क्योंकि उस महान् पिश्टपेशण का यह भी एक अपरिहार्य अंग है। कारण वह घट रह है।

मैं जटाओं को


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