मन ने यह गणना भी कर ली कि प्रतिदिन कम-से-कम दस से बीस कविताओं की रचना और पुराने हर संस्करण के साथ कंठस्थ करने का क्रम रखा जाए, तो एक या आधा लाख महाकाव्य की रचना करना संभव है। तो फिर शुभस्य श्शीघ्रम्- आज ही हो जाए श्रीगणेश। प्रथम श्री गुरूगोविन्दसिंह का चरित्र गान।
श्री गोविन्दसिंह का चरित्र
क्योंकि गोविंदसिंह हुतात्माओं के मुकुट मणि थे। महान् यश से मंडित महापुरूश राजप्रासादों के सुवर्ण कलशों जैसे तेजस्वी दिखते ही हैं। परंतु आज उनका चरित्र
बखानने में, उनके यशोगान करने से मुझे उतनी श्शांति नहीं मिल सकती, उलटे मेरे सिर पड़ी असफलता की तीव्रता अधिक कश्टप्रद हो सकती है। आज मेरा ध्येय यशोमयी राजप्रासाद के पैरों तले गहराई में दबी अपयश की उस नींव का चिंतन करना है। इसीलिए आज मुझे गुरू गाविंदसिंहजी की असफलता की गाथा गानी है, ’चमकौर’ दुर्ग से पलायन
इससे क्या जीवन व्यर्थ जाता है? भई, जीवन स्वयं ही क पिश्टपेशण है। पंचमहाभतों को निचोड़, बटकर जीवन की यह रस्सी बटनी है, बार-बार तंतुओं को लंबा करते रहना और अंत में मृत्यु के मोगरे से कूटकर पुनः जटाएं बनाकर पंचमहाभूतों के ढेर में उन्हें मिला देना।
प्रातः के पश्चात् संध्या, संध्या के पश्चात् पुनः सवेरा-सभी पिश्टपेशण । वनस्पति खा-खाकर जीना, जीते जीते मर जाना, मरते ही उस अस्थि-मांस को वनस्पति खा जाए-सभी पिश्टपेशण। तेजामेधा की सूर्यमाला, सूर्यमाला की पृथ्वी, इस धरा