में नहीं आ रहा। बस, तय हो गया पच्चीस वर्शों में एक महाकाव्य की रचना करना। यह देखकर कि यदि हेग का निर्णय विपरीत हो गया तो बंदीशाला में हाथों से कठोर परिश्रम करते-करते ही (ऐसा प्रतीत हो गया कि) अन्य किसी भी साधन के अभाव में यह एक कार्य तो संभव है। यह देखकर मन की कार्यपिपासा श्शांत हो गई सी लगी। छअपटाहट थम गई। हेग का निर्णय विपरीत सिद्व हो गया। पच्चीस वर्शों के बजाय अकल्पित भयंकर दंड हुआऋ पचास वर्ष, तथापि वही कार्यøम निश्चित किया। इतना ही नहीं, यह देखकर कि अंगीकृत महान् ध्येय की सिद्वि के लिए ऐसी निस्सहाय एवं निराश अवस्था में भी इतना कुछ तो किया ही जा सकता है और अभी तो कुछ ऐसा करना संभव है, जिससे यह जीवन कृतार्थ हो सकता है, मन की उदासी कुछ कम हो गई। ऐसा प्रतीत हुआ कि निश्क्रिय विफलता के भय का बोझ हलका हो गया। आतुर


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करते हुए कहा,’’ कुछ नहीं, बस यूं ही। कानूनी तौर पर कुछ-न-कुछ काम तो देना ही है। आपसे जितना बने कीजिए,उसकी कोई चिंता नहीं है।’’

उसने उस बोझे को नीचे उतारा। उसे खोला और उसके टुकड़े टुकड़े किए। फिर मुझे दिखाया कि किस किस तरह उसे ठोक-धुनकर उसकी रस्सी बनाई जाती है। तो फिर यह है-सश्रम कारावास।

जगत् का पिश्टपेशण

हूं-चलो, करो इसका सामना। बस, नारियल की जटाएं ही तो कूटनी हैं न! हां रे, पागल मनुआ! भला इसमें ओछापन कैसा?


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