कारागृह की एकांत कोठरी की इस श्शांत धूलि पर लेटते ही यह इच्छा पुनः दृश्टिगोचर होने लगी। इस कोठरी में कठोर परिश्रम करते हुए भी कम से कम रात्रि में अकेले पड़े रहने पर बत्ती न दी या कागज-पेंसिल का टुकड़ा पास न रखने दिया, तो भी एकाध काव्य की रचना संभव है। मन-ही-मन कविता रच, कंठस्थ कर अपने स्मृति-पत्र पर ही उसे लिखता गया तो इस पर तो कोई प्रतिबंध नहीं लगा सकता। वर्तमान की इस अत्यंत निर्दय साधनहीनता में भी यह कार्य करना तो संभव है ही। औरयदि इस तरह मैं एकाध काव्य रच सका तो इस बंदीवास से कभी मुक्त होने पर, और यदि मुक्ति नहीं भी मिली तो भी अपनी मातृभूमि के चरणों में यह एक नवोपहार अर्पण किया जा सकता है। इतना कार्य भी कम नहीं है।
फिर तब तक यह एक कार्य तो कार्यान्वित करूं जब तक उससे महत्वपूर्ण कोई अन्य कार्य संभवनीयता की कक्षा
करो। ईश्वर आपके ये दिन भी पार करेगा। आप पर पड़े संकट का भगवान् साक्षी है। मेरे परिवार के लोगों की भी आखें भर आई। परंतु मैंने गर्व से सभी को आश्वस्त किया कि इस संकट में भी वे नहीं डगमगाएंगे। फिर यह क्या। आप चिंता मत कीजिए।’’
उसके इस सद्भावनापूर्वक समझाने का परिणाम एकदम विपरीत हुआ। चिंता करने लायक कुछ घटित हुआ है, इसका मुझे स्पश्ट स्मरण हो गया। मन में एक चुभन सी हुई। मैंने पूछा, ’’यह बोझा किसलिए?’’ हवलदार ने हंसने की चेश्टा