कभी-कभार हाथ लग जाए तो मात्र पढ़कर संचित किया हुआ ज्ञान उस फलहीन वृक्ष अथवा जलाशय में जलसंग्रह की तरह ही व्यर्थ होगा, जिसके जल से हजारों तो क्या, एकाध प्यासे की तृश्णा का भी श्शमन नहीं होता, अथवा न ही अन्नोत्पादन से क्षुधा का श्शमन होता है। जिन्होंने महान् तथा उपयुक्त कार्य किये हैं, मेरे समान कारावास तो उनमें से किसी एक को भी नहीं भुगतना पड़ा। ऐसे इस कठोर साधनहीन बंदीवास में भला मैं कौन सा कार्य कर सकता हूं- यह विकट समस्या थी।

महाकाव्य

धुर बचपन से ही एक इच्छा थी कि मराठी में एक महाकाव्य2 लिखा जाए। क्या, किस तरह, इतना ही नहीं अपितुु मुझे इस बात का भी निश्चित ज्ञान नहीं था कि


महाकाव्य होता क्या है? पर लिखूंगा, यह निश्चिय था। उस छुटपन से आज तक यह इच्छा सालती रही थी। कर्मक्षेत्र के घमासान में यद्यपि यह मनीशा मन से ओझल हो चुकी थी तथापि


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था-बताया, ’’समय पूरा हो गया है, चलिए।’’ मैं सीढ़ियां चढ़ता ऊपर अपनी कोठरी में आ गया। परंतु जो विचार कर रहा था उसी में उलझाा होने से वैसे ही बैठा रहा। उस निमग्नता में काफी समय व्यतीत हुआ कि पुनः दरवाजा खड़का और हवलदार ने भीतर प्रवेश किया। उसके साथ एक बंदी था, जिसके सिर पर एक गठरी थी। सोचते-सोचते मेरा चित्त श्शांत हो गया और मैं पल भर के लिए उसी तरह आंखें खोले निश्चित बैठा रहा। इसे देख हवलदार ने कहा,


’’राव साहब, चिंता मत


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