निश्चित किया था अब वही दुगुना करना है। इन पच्चीस वर्शो में इस असहाय, निःसाधन तथा निरूत्साही विजन बंदीवास में भला ऐसा कौन सा कर्म किया जा सकता है, जिसके अर्पण द्वारा मातृभूमि का ऋण अल्प, स्वल्प मात्रा में ही क्यों न हो, हलका हो और मानवजाति की कुछ विशेश
सेवा हो सके। राले से लेकर को, जिसने ’पिलग्रिम्स प्रोग्रेस’ लिखा-लेखन-सामग्री मिलती थी। मझे पेंसिल का आधा इंच टुकड़ा पास रखना भी मना था। फिर स्टेड सरीखे बंदी की तरह उन विशयों पर लेख लिखने का नाम ही नहीं लेना चाहिए, जिन्हें अखबारों में निरूपद्रवी समझा जाता था। उस कोठरी में, जिसमें मुझे रखा गया था, पंछी तक पर नहीं मार सकता था, फिर प्रचार की बात ही क्या करना् ! कागज का टुकड़ा रखना भी जहां अपराध समझा जाता हो, वहां लेखन! क्लम घिसना सर्वथा असंभव ही था, स्वयं ही पठन द्वारा ज्ञान-प्राप्ति और भूली-बिसरी एकाध पुस्तक
कभी ं ं ं ं ऐसे विचार आते। एक दिन मुझे सामने के घर के एक निवासी को पुलिस द्वारा धमकाने का समाचार मिला।
मेरे कारण दूसरों को कश्ट न हो, इसलिए तब मैं यथासंभव आंखे नीची करके टहलता था। इस व्यायाम के समय मुंह से योगसूत्र का पाठ करता और इसके पश्चात् उसके एक-एक सूत्र पर विचार करते हुए उसकी छानबीन करता। आज भी नित्य क्रमानुसार इसी तरह के विचारों में उलझा हुआ मैं व्यायाम कर रहा था। इतने में एक हवलदार ने-जिसे मेरे लिए ही नियुक्त किया गया