यह मानकर चलने की थोड़ी आदत और श्शक्तिवाले मेरे मन पर एकाएक इतना भयंकर आघात हुुआ कि मूच्र्छा आ जाए। मैं जब लंदन में पकड़ा गया था1 तभी मैंने समझ लिया था कि अंदमान में पच्चीस साल गुजारने पडे़गे। मार्सेलिसस में मैं फिर से तब पकड़ा गया2 जब सारा शिक्षित जगत् कह रहा था


कि मुझे फ्रांस को लौटा दिया जाएगा- ऐसा वे निश्चितता से कह रहे थे-फिर भी मैंने मान लिया था कि अधिकतर फांसी चढ़ना होगा। परंतु अंत में दोनों ही निराशओं को झुठलाकर एक तीसरी निराशा अचानक आ धमकी, जो एक प्रकार से इन दोनों से भी महाभयंकर थी- पचास वर्ष का दंड1। इस तरह की उदास एकांत कोठरी में अकेले जीवन गुजारना-अकेले एक-एक घंटा गिनते हुए जीवन बिताना! ठीक है-यही होगा।

’हेग’ का निर्णय होने से पहले ही पच्चीस वर्ष कैसे निकालूंगा, इसका एक मनोमय चित्र बनाया था। उसमें जो माप


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मुझे देख रहे थे। डोंगरी का कारागृह मध्य बस्ती में है- ऐसा लगता है, क्यांेकि आस-पास थोड़ी दूर पर ऊंची ऊंची इमारतें तािा घर दिखाई देते हैं। उधर व्यायाम करते समय उन इमारतों और खिड़कियों के पास स्त्री-पुरूशों की भीड़ लग जाती और वे तब तक आपस में खुसर-पुसर करते रहते जब तक मैं अपना व्यायाम समाप्त कर वहां से चला नहीं जाता। पुलिस का आंख बचाकर मैं भी कभी कभी उनके प्रणाम स्वीकार कर प्रति-प्रणाम करता। मन में उनका वह पूज्यभाव देखकर कभी अच्छा लगता, पर


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