यह परिचय पूरा होता गया। अब कोई संदेह शेश नहीं रहा। आशा नहीं थी,
तथापि यह संभावना थी - कदाचित् हेग के निर्णय से मुक्ति संभव हो- पर अब वह समाप्त हो गई। अब यह निश्चित है कि संपूर्ण जीवन इसी तरह की किसी कोठरी में सड़ता रहेगा। तो फिर? इसका भी सामना करना होगा, और क्या?
वही होगा जो प्रतिकूल है
मेरे इस कश्टमय हेतुपूर्वक स्वयं पर गिराए गए संकट रूपी पर्वत के नीचे पिसते जीवन में यदि कोई एक नियम अतिशय कटु परंतु हितसाधक सिद्व हुआ है, तो वह यह कि सदैव वही होगा जो प्रतिकूल हो। उसका डटकर सामना करने के लिए मानसिक तैयारी करना।
जिन जिन व्यक्तियों का जन्म अत्यंत विपरीत देश, काल और परिस्थिति में हुआ हो, फिर भी जो उससे भंयकर संघर्श कर, उसे पराजित कर, उसकी छाती पर खड़े होकर किसी नवयुग का, किसी महान् ध्येय का सुप्रभात
सब लोग चले गए। मैं नीचे बैठा शेश रहे हम दोनों-मैं और मेरा दंड। अकेले उस उदास कोठरी में एक-दूसरे का सामना करते हुए, एक-दूसरे का मुंह देखते हुए।
इसके आगे उस दिन की कहानी तथा ह्नदय में मची खलबचली हमने ’सप्तर्शि¹
कविता के पूर्वार्ध में उसी पुस्तक में प्रकाशित की है।
दूसरा दिन
’’ पौ फट गई है।’’ जमादर ने आकर कहा,’’ यद्यपि आपकी सजा प्रारंभ हो गई है तथापि आपको पूर्व की भांति ही प्रातः व्यायाम के लिए सैर करने नीचे लाया जाए, साहब ने कहा है।’’