में उस थैली को उलटी करके वे उसे धूप में रखते और रात में उसमें घुसकर खर्राटे भरते।’’
’’तिलक, आगरकर के साथ वे यहां थे, उसके बाद भी कभी इधर रहे क्या?’’ कोठरी में थे। एक दिन खटमलों ने उनका लहू चूस चूसकर रात भर उनकी नींद हराम कर दी। मैंने सवेरे द्वार खोला, देखा तो तिलक खटमलों का शिकार करने में व्यस्त हैं। मैंने पूछा, ’क्यों महाराज, ठीक तो हैं न आप! ’वे श्शांति के साथ मुस्कुराते हुए बोले, ’ठीक तो हूं जमादार, केवल कल रात भर आंख नहीं लगी। तनिक भीतर तो आइए, देखिए आपके ये पालतू कीड़े।’ मैंने देखा, तो खटमलों की पंक्तियां भीत पर जा रही थी। ’परंतु तात्या साहब, यह जो राजनीतिक कार्य आपने हाथ में लिया है, वह सफल होगा क्या?’’
हवलदार आादि लोग चले गए। पुनः मैं और मेरा दंड दोनों आमने सामने एक दूसरे से परिचित होने के लिए खड़े रहे।
प्ल भर के लिए उसका कुछ भी अर्थ उजागर नहीं हुआ। पल-दो पल में ही उसमें निहित भयंकर अर्थ उजागर हो गया। दंड सन् 1910 में और सन् 1960 में!
ं ं ं ं ं ने निर्मम व्यंग्य से कहा, ’’कोई चिंता नहीं। दयालू सरकार आपको सन् 1960 में अवश्य मुक्त कर देगी।’’
मैंने उपहास में कहा, ’’परंतु मृत्यु अधिक दयालू है। उसने मुझे इसके पूर्व ही मुक्त कर दिया हो?’’ दोनों ही हंसे। वह सहज हंसा और मैं प्रयत्नपूर्वक हंसा। सुपरिटेंडेंट कुछ और चर्चा के बाद चला गया।