कभी लगता था, क्या बताने के उद्देश्य से वह सब भुगत लिया था? तो फिर उसे निद्रा अभिनय की कहना चाहिए। कभी लगता था, हमें जो यातनाएं भुगतनी पड़ीं उन यातनाओं को भुगतते-भुगतते जो लोग उन यातनाओं के शिकार हो गए, उनको तो घर लौटकर प्रियजनों को अपने वे सुख-दुःख बताने का भी संतोश नहीं प्राप्त हुआ। वे साथी आज हमारे बीच नहीं हैं, जिनके साथ तप की जलन को सह लिया था, उनको छोड़कर समारोह की दावत के पकवान अकेले ही कैसे खाएं? क्या यह उनके साथ प्रताड़ना नहीं होगी?

और हम जैसे कतिपय मनुश्यों पर आज तक ऐसे विकट संकटों का सामना करनेवाले आह्नान आ गिरे हैं और अभी भी इसी प्रकार के अथवा इससे भी भयानक आह्नान आ गिरनेवाले हैं। इस जीवन-कलह के नगाड़े के कोलाहल के बीच हम अपनी


इतनी सी हलगी क्यों बजाते रहें?

दुःख के गले में आक्रोश का ढोल तो


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के कारण स्निग्ध होने वाले मधुर आनंद का अनुभव करने के लिए हमारा ह्नदय हमारी मुक्तता के क्षणों से स्वाभाविक ही व्याकुल होता आया है।

फिर भी आज तक अंदमान की कहानी होठों तक पहुंचने पर भी किसी तरह होंठों से बाहर नहीं निकल रही थी। अंधकार में बढ़नेवाली किसी कंटीली पुश्पलता की भांति उन अंधियारे दिनों की याद उजियारे को देखते ही सूखने लगती, भौंचक्का हो जाती।

कभी लगता था, क्या बताने के उद्देश्य से वह सब भुगत लिया था? तो फिर उसे निद्रा अभिनय की कहना चाहिए। कभी


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