देती हुई दिखती थी, उस गुब्बारे की तरह गोल-मटोल, जो स्कूलों में पृथ्वी का आकार दिखाने के लिए रखा जाता है, दो कदम अनके आगे भागती और उनकी इस तोंद पर मध्य तक चढ़ाए हुए पाजामे पर वह चमड़े का पट्टा भमध्य रेखा की तरह शोभा देता।
सन् 1857 के विद्रोह की चर्चा
बारी साहब ने प्रारंभ किया, ‘‘लोगों ने आपको बताया ही होगा कि मैं आपका बंदीपाल (श्रंपसमत) हूं’’ मैंने केवल सस्मित देखा। ‘‘परंतु मैं आपसे कहता हूं कि मैं आपका एक मित्र हूं।’’ साथ में आए हुए अतिथि मौन थे, क्यांेकि बारी साहब प्रत्यक्ष बोलने का अधिकार अपने विशेष चमचे को ही देता, अन्य लोगों को नहीं।’’ मुझे आप जैसे शिक्षित, पढे़-लिखे मनुष्य से संभाषण करना बड़ा अच्छा लगता है। अतः मैं इस तरह कभी-कभी यंू ही खुलकर वार्त्तालाप करने आ जाता हूं। आपने सन् 1857 के उस
दुष्टतापूर्ण विद्रोह का इतिहास लिखा
थोड़ा रिक्त स्ािान था। उस पिंजरे में अन्यत्र बहुत भीड़ हो गई थी, उसकी तुलना में मेरे कोने में कम भीड़ थी और इसी कारण मुझे इस कोने में बिस्तर बिछाने की सहूलियत दी गई थी। परंतु इतने में सड़ी हुई दुर्गंध का इतना तीव्र भपारा आया कि नाक सड़ गई। मैंने अपनी नाक जोर से दबाकर बंद की। यह देख निकट के एक बंदी ने संकेत किया कि धंुधले उजाले में रखा वह पीपा देखो। देख तो ज्ञात हुआ कि यह पीपा ही रात भर सभी प्राणियों को शौचकूप के स्ािान पर काम आनेवाला है। मेरी