के साथ, गुपचुप बारी साहब उन्हें बंदीगृह में ले आते और मुझसे भेंट करवाकर अथवा दूर से मुझे दिखाकर इस तरह गंभीर मुद्रा बनाते कि तुम लोगों पर पहाड़ जैसा विशाल उपकार किया, अब मै। इस विवेचना में गर्क हूं कि इसके आगे इसे कैसे पार करूं। ‘ज्ींज ूपसस कव! ज्ींज ूपसस कव!’ कहते हुए वे अतिथियों को लेकर झट से वापस चले जाते। मुझे ऐसे कई गोरे सार्जेंट तथा महिलाओं के उदाहरण ज्ञात हैं जो यह स्वर्ण अवसर पाने के लिए पंद्रह-पंद्रह दिन बारी साहब की कोठी पर उनकी अनुनय-विनय करते रहे थे।
‘‘सरकार!’’ वाॅर्डर के चिल्लाते ही मैं वहां के नियमानुसार सीधा खड़ा रहा। कोठरी की सलाखों के छोटे द्वार में से बारी साहब के दिखने के पहले ही उनकी निकली हुई तोंद दिखाई देने लगती। क्योंकि उनकी वह तोंद, जो उनके संपूर्ण शरीर को पछाड़ती हुई और संपूर्ण विश्व को तुच्छतापूर्वक चुनौति
हुए थे; चोर-उचक्के, डाकू, पापी-दुष्ट, असाघ्य इंद्रिय रोग से ग्रस्त; कुछ ऐसे घिनौने, जिन्होंने वर्षों से दांत भी नहीं मांजे थे। इस तरह के चालीस-पचास आदमियों की बिछौनों पर बिछौने बिछाए हुई भीड़भाड़ में मैं भी अपना बिस्तर बिछाकर लेट गया। मेरे पैरांे से किसी का सिर सटा हुआ था। मेरे सिर से ही नहीं अपितु मुहं के पास किसी की टांगे सटी हुई और तनिक उधर मंुह करे तो मुख से मुख
सटा हुआ। पल भी चित लेटा। सामने ही एक बड़ा सा पीपा आधा काटकर रखा हुआ था। उधर