जमादार अथवा ‘पेटी अफसर’ अर्थात् वह बंदीवान अधिकारी, जिसे बंदियों से तरक्की मिली हो, नियुक्त किया जाता। ऐसे ही उन तीनों वाॅर्डरों के हाथ मुझे सौंपकर कोठरी में बंद कर, ताला लगाकर वह जमादार चला गया।
दूसरे दिन प्रातःकाल लगभग आठ बजे वे पठान वाॅर्डर जल्दी-जल्दी मेरी कोठरी के सामने आकर बोले,‘‘साहब आता है, खड़े रहो।’’ मैं द्वार के निकट आ गया। द्वार अर्थात् कोठरी की सलाखों का नित्य बंद रहनेवाला द्वार। बारी साहब अपने साथ और कुछ गोरे लोग लेकर आए थे। उस कारागृह में मेरा आगमन होने से बारी साहब को एक नया महत्तव प्राप्त हो गया था। तत्रस्थ यूरोपियन स्त्री-पुरूषों की मुझे देखने तथा यथासंभव मेरे साथ थोड़ा संभाषण करने की इच्छा होती थी। अतः उन्हें बारी साहब की आरती उतारने के अतिरिक्त अन्य कोई उपाय ही नहीं रहता। काफी अनुनय-विनय करने के पश्चात् अत्यंत सावधानी
लगाते हुए मैं ऊब सा गया था। यह सुनकर कि सचमुच ही मुझे पचास वर्षों का दंड हुआ है-केवल उन्हें ही नहीं अपितु सहÛाधिक दंडितों को भी, जिनकी पंद्रह बरस के दंड से ही सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई थी, धीरज बंधता। उन सभी बंदियों का दुःख मुझे देखते ही हलका हो जाता।
जलयान की गंदगी
कुछ देर बाद संध्या हो गई। गरमी से जान निकलती, तिसपर इतना भीड़-भड़का। उन चालीस-पचास लोगों में, जिनमें हिंदु-मुसलमान सब थे, कुछ तो घिनौने जीवन के अभ्यस्त बनकर निर्लज्ज बने