यहीं पर इसके मूल कारण का थोड़ा सा विश्लेषण किया है। इन मुसलमानों में पठान, सिंधी, बलूची जैसे व्यक्तिगत अपवादों को छोड़कर प्रायः अधिकतर मुसलमान अत्यधिक क्रूर, नृशंस तथा हिंदू-द्वेष से लबालब हुए होते । उनसे बहुत नीचे पंजाबी मुसलमान तथा अन्य बंगला, मराठी, तमिल आदि मुसलमान बंदीवान व्यक्तिगत अपवादों को छोड़कर प्रायः न तो इतने दुष्ट थे और न ही हिंदू-द्वेष से भरे हुए। तथापि उनकी इस सज्जनता को दुर्गुण घोषित कर उपर्युक्त क्रूर मुसलमान नित्य नियम से उन पर व्यंग्य करते और ‘यह तो आधा काफिर ही है’ कहकर उनका उपहास उड़ाते, परिणामस्वरूप ये पंजाबेतर मुसलमान भी धीरे-धीरे पठानों का अनुकरण करने लगते। तथापि वे तत्रस्थ सरकार के विश्वासपात्र नहीं थे। अधिकारियों का रूझान व्युत्क्रम से उनकी ओर ही आकर्षित होता जो अधिक क्रूर होते ।
एतदर्थ मुझ पर तो मुसलमानों में ही नहीं, पठानों में भी जो अत्यंत बेशर्म वाॅर्डर,
ने मेरी ओर संकेत करते हुए कहा,‘‘ देखो भैया, तुम्हारी-हमारी छोड़ो। वह देखो, बालिस्टर साहज! भई, अंग्रेज अफसर भी टोपी उतारकर इन्हें प्रणाम करते हैं। भला इनके दुःख के सामने हमारा दुःख क्या है?’’ इतना कहने की देर थी कि धीरे-धीरे सभी मेरे इर्दगिर्द जम गए। प्रायः सभी को ज्ञात ािा कि मुझे पचास वर्षो का दंड मिला है, तथापि हर कोई पूछता-कितने वर्षो का दंड
मैंने अपने गले में लटका हुआ क्रमांक का वह बिल्ला ही उनके हाथों में थमा दिया। बार-बार ‘पचास-पचास की रट