अधिकारियों में स्ािान मिलना असंभव हो गया। जो हिंदू दंडित अधिकारी थे, उन पर मिथ्या दोषारोपण कर पठान बंदियों ने उन्हें निकाल दिया और पठान बंदियों की अधिकारियों के पदों पर नई भरती होती रही। पठान अधिकारी नित्य पठानों का पक्ष लेते। उनकी यही एकता सत्कर्माें मंे एक आदर्श सिद्व होती। उनके इस मेल के कारण पठान मुसलमानों, सिंधी मुसलमानों, बलूची मुसलमानों के गुटों के बंदी अधिकारी अपनी-अपनी जातियों के बंदियों को यथासंभव हिंदुओं को अधिक-से-अधिक यंत्रणा देने के लिए प्रोत्साहित करने लगे। अतः हम हिंदू राजबंदियों के उस कारागृह में प्रवेश करते ही केवल वहीं पर नहीं अपितु संपूर्ण अंदमान में हिंदू दंडितों तथा दंडित अधिकारियों की दुर्दशा का कोई ठिकाना नहीं रहा। इसका वृत्तांत धीरे-धीरे आगे आता ही रहेगा कि इसके परिणाम कितने दूर-दूर तक पहुंचते गए थे। वह वृत्तांत ठीक-ठीक समझ में आए, इसलिए
देखने लगे-किनारा दृष्टि से ओझल हो गया। ‘घर छूट गया भई, घर छूट गया’ कहते हुए उनमें से एक धम्म से नीेचे बैठ गया। यह सुनते ही‘ अब अपना देश हम पुन‘ कब देखेंगे?’ ऐसे बिलबिलाते हुए सतारा की ओर के दो किसान फूट-फूटकर रोने लगे। ‘अब कालापानी लग गया! भैया, रो मत। कालेपानी में रोने से कुछ नहीं होता। ’ इस तरह इन दंडितों में से जो छंटे हुए बदमाश अपराधी थे, दार्शनिक की तरह बीचोबीच खड़े होकर सभी को सांतवना दे रहे थे। बीच ही में किसी