व्यवहार करने की संभावना अधिक होती। हमारे राजबंदी होने से हमारी वास्तविक गतिविधियों को तिल का ताड़ बनाकर और जो नहीं भी हैं, उन्हें नमक-मिर्च लगाकर अधिकारियों तक पहुंचाना तथा यथासंभव हमसे क्रूरतापूर्ण व्यवहार करना हिंदुओं के लिए इतना सरल नहीं था जितना कि मुसलमानों के लिए। अतः हिंदुओं के लिए पदोन्नति और वेतन-वृद्वि कठिन होने लगा।
दूसरी बात यह है कि पठानों को इन दुष्टापूर्ण कार्यों के लिए सिर पा चढ़ाना, अधिकारियों के लिए अनिवार्य हो जाने के कारण इन कुकर्मी मुसलमानों का, जिन्हें धर्मांधता ने बाल्यकाल से यह घुट्टी पिलाई थी कि हिंदुओं को अत्यधिक कष्ट देने से ‘सर्वपापं विनश्यति’, हिंदुओं के विरूद्व मिथ्या चुगलियां, उलाहनों को खड़ा करके उन्हें अधिकाधिक पीड़ा देना संभव हो गया था, क्यांेकि सभी का अनुभवसिद्व विश्वास था-बारी बाबा मुसलमानों के विरूद्व एक शब्द भी नहीं सुनेगा। इस प्रकार हिंदू बंदियोें को
को जैसे उनका यह व्यवहार अखर गया और वह हेय तथा क्रुद्व दृष्टि से उन्हें और मुझे घूरकर बिना प्रणाम
किए चलता बना । जैसे उसकी दृष्टि जता रही थी-’ भला इस पापी बंदी को इतना सम्मान क्यों?’
प्रस्थान
जहाज की सीटी के पश्चात् भों-भों-भों की कर्णकटु आवाज आई और एक हिचकोले के साथ जहाज चल पड़ा। उसक पिंजडे़ की ऊंचाई पर दो-तीन छोटी-छोटी गोलाकार खिड़कियां थी, जो शीशे से बंद की गई थी। उनसे लटकते हुए, उन अभागे दंडितों में से कुछ तट की ओर टकटकी लगाकर