धीमी आवाज में बतियाने लगते अथवा चुप हो जाते। और वे वाई के पत्रकार-हां-हां, वही जो आप कह रहे हैं- वृद्व लेले- जो कुबड़े थे, वे भी यहीं पर साधारण बंदी थे। उनकी बुद्वि बड़ी कल्पनाशील थी। इधर खटमलों की भरमार हो गई थी। लेले बहुत झुंझलाते। वस्त्र मिलते, उन्होंने उनमें से एक महीन परंतु सघन चादर निकाली और वे उसकी, जैसे तकिये की बनाते हैं, आच्छादन की खोल सीने लगे। हमने यूं ही पूछा,’ष्शास्त्रीजी, यह क्या सिलाई कर रहे हैं? साहब बिगड़ेगा।’ उन्होंने कहा,’ठहरो जरा और देखते जाओ मैंने इन खटमलों के लिए एक रामबाण औशधि ढूंढ निकाली है। आपको भी देता हूं।’’ चंद घंटों में खोल तैयार हो गई और देखते देखते वह बामन उसमें घुस गया, जैसे तानकर सोए तो तब उठे जब हमने ही सवेरे दरवाजा खटखटखाया। तब से मजाल है कि एक खटमल ने कभी उन्हें सताया हो। दिन


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किंतू मन उदास सा हो गया। सुपरिटंेडंेट यूं ही कुछ इधर उधर की बात कर रहा था। उसके संवाद में मन को बलात् उलझाया।

इतने में सिपाही ने एक लोहे का बिल्ला लाकर हाथ में दिया। यही वह ’क्रमांक’ है जो प्रत्येक बंदी की छाती पर झुलता है। उस बिल्ले पर बंदी की मुक्ति का दिनांक अंकित होता है। मेरा मुक्ति दिनांक! मुझे मुक्ति भी है क्या? मृत्यु ही मेरी मुक्ति का दिनांक है। कुछ जिज्ञासा, कुछ निराशा, कुछ विनोदमिश्रित भाव से मैंने उस बिल्ले की ओर देखा। मुक्ति का वर्ष था-सन् 1960!


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