बलूची मुसलमानों के अतिरिक्त अन्य किसी को भी पहरेदारी का काम नहीं सौंपा जाता। जिसको यह काम सौंपा जाता उसे इसमें अपना बड़ा गौरव लगता, क्यांेकि वे इस बात पर इतरा सकते थे कि अधिकारियों का उन पर कितना दृढ़ विश्वास है। उनके माध्यम से अधिकारी हमारे गुप्त भेद जान सकते थे। साथ ही वे अधिकारियों के सभी तरह के अन्यायपूर्ण एवं नृशंसतापूर्ण काम करने के अभ्यस्त थे। अतः इन बलूची और पठान मुसलमानों को अधिकारी भी अधिक ढील देते थे। उनका अनियमित ही नहीं अनीतिमान आचरण भी क्षम्य मानकर इस तरह की नीति अपनाते कि अन्य सभी पर और विशेषतः हिंदुओं पर उनका दबदबा रहे। हम सब राजबंदियों के हिंदू होने के कारण और उस बंदीगृह में हमारे आगमन के कारण हिंदुओं पर जैसे संकटों का पहाड़ ही टूट पड़ा था। हम हिंदू दंडितों पर हिंदू जमादार रखा जाए
तो उसके हमसे सहानुभतिपूर्ण
न रखते हुए मेरा बिछौना एक कोने में, जहां जहाज का छेद था, उसके सामने सीखचों के पास डालने का आदेश दिया। आगे शीघ्र ही ज्ञात होगा कि इस विशेष सुविधा का मुझे क्या लाभ हुआ।
इतने में एक और सज्जन आ गए, उन्होंने मार्सेलिस की बात छेड़ी। मैंने भी खुलकर थोड़ी चर्चा की। ‘‘आपसे मिलने हम हेतुपूर्वक आए थे। ईश्वर आपको वापस स्वदेश ले आए, यही हमारी हार्दिक कामना है।’’ इतना कहते हुए वे सभी अधिकारी अपनी टोपियां उतारकर प्रणाम करके चले गए। एक गोरे गृहस्थ