करना संकट के समय मेरा अति उपयुक्त नियम रहा था, जिसका अनुसरण करके मैंने सोचा, ‘इसका अभिप्राय यह कि अधिक-से-अधिक पांच वर्ष तक मुझे कोठरी में बंद रखा जाएगा। बस ठीक है! ठस बंदीगृह को, जो बुरा नहीं है, अपनी हवेली समझकर पांच वर्ष यहीं पर डेरा डालंेगे, काव्य-रचना करेंगे, सरकारी आज्ञा से नहीं अपितु स्वेच्छया निश्चय से यह नियम बना लेंगे।’
इसी मानसिक खिलौने से खेलते-खेलते मैं तृतीय तल पर पहंुच उस कोठरी के द्वार के पास खड़ा ही रह गया था। इस कारणवश कि मैं उधर आ रहा हूं, वह पूरी इमारत जिसमें लगभग डेढ़ सौ लोगा रहते थे, खाली की गई थी। केवल दृष्टि से उत्तम परंतु बंदियों की दृष्टि से चुगलखोर, पापी, कुकर्मी तीन ऐसे वाॅर्डरों को वहां रखा गया था। वे तीनों बलूची तथा पठान मुसलमान थे। राजनीतिक बंदियों पर और उसमें भी विशेषकर मुझपर प्रायः पठान,
ठूंस दिया गया। इंग्लैंड में ‘ब्रांकाइटिस’ रोग का शिकार हो जाने के कारण मुझे जरा से तंग स्थान पर जाते ही सांस लेना दूभर हो जाता, छाती में दर्द होने लगता और दम घुटने लगता। अतः मैंने उस गोरे अधिकारी को, जो मेरे साथ था, बताया कि इस प्रकार के तंग व घुटन भरे स्ािान पर मुझे रखने से गड़बड़ हो सकती है। उसने जहाज के डाॅक्टर को सूचित किया। उसने कहा, ‘फिलहाल तो इधर ही रहो, स्वास्थ्य खराब होने पर देखा जाएगा। और विशेष सुविधा के तौर पर मुझे उस पिंजरे में