होने की भावना को त्याग दो तो इस हवेली में भी रहना उतना दुस्सह नहीं। निवास के संबंध में वेदांतियों का यह जो कथन है कि मम और नमम में ही सुख-दुःख के बीच निहित हैं, उनका यह कहना व्यर्थ नहीं है। ठीक है, यथासंभव यही प्रवृत्तिा रखी जाए। इतना सुंदर घर और वह भी बिना भाड़े के मिल जाए तो उसे बंदीशाला कहकर उससे व्यर्थ भयभीत क्यांे होना? कुछ दिन इधर ही प्रसन्नतापूर्वक क्यों न रहा जाए?
परंतु कुछ दिन अर्थात् कितने दिन? आशंका ने प्रश्न उठाया और मैंने खुसुर-फुसुर की, ‘यहीं पर तो भेद है।’ अंदमान के नियामानुसार छह महीनों के पश्चात् बंदियों को कारागृह से बाहर छोड़ दिया जाता है। अन्य लोगों की अपेक्षा मुझपर क्रोध कुछ अधिक है, तो अधिक-से-अधिक एक वर्ष अंदर रखेंगे। सिपाहियों ने बताया था कि तीन वर्षाें के ऊपर किसी भी व्यक्ति को आज तक सिल्वर जेल में एक साथ लगातार
किंतू संकरा था, जिसमें कोई बीस-तीस व्यक्तियों को ही रखा जा सकता था। परंतु हेतुपूर्वक वह इस तरह बनाया गया था कि जिसमें आजन्म कारावास के कालेपानी के बंदीवान जानवरों की तरह ठूंसे जाते। उसमें मैंने देखा कि उन बंदियों को, जो ठाणे से आए हैं, ठेलाठेली के साथ ठूंसकर खड़ा किया गया है। मैं मन-ही-मन सोच रहा था, क्या मुझे भी इस जहाज के इस घुटन भरे तलमंजिले के अंधेरे पिंजरे में इन बंदियों के साथ ठूंसा जाएगा? इतने में ही उस पिंजड़े का द्वार खुल गया और मुझे उसी में