गरम पानी के फववारों की सुखद फुहारों भरे स्नानों तथा संस्कृत संकल्पों द्वारा नहीं। ‘लो पानी’- इन कर्कश शब्दों के कठोर संकल्प द्वारा तीन कटोरे खारे पानी के स्नान से ही होगा।

कपड़े पहनकर आगे बढ़ा तो उस त्रितल (तीन तलीय) इमारत के दर्शन हुए। इसकी भीतें ईटों तथा पत्थरों से पक्की बनाई हुई थी, लंबी-लंबी एक ही ऊंचाई की सलाखों से उसमें विभिन्न खाने बनाए हुए थे, आग के भय से उसे कहीं भी लकड़ी का स्पर्श नहीं होने दिया था और उसमें एक जैसी, सप्रमाण रचना देखकर मन इतना हर्ष-विभोर हो गया जैसे मैं कोई सुगठित हवेली देख रहा हूं। यही सात नंबर चाली है, इसी के तृतीय तल पर मुझे रहना है। वाह! उत्तम हवा मिलेगी और भरपूर प्रकाश! ऐसा अपना घर होता तो मैं कितना श्रीमंत होता और कदाचित् चार-चार महीने इस विस्तृत भवन में और इस हरे-भरे आंगन में सुख से रह जाता। बस, इसक बंदीशाला


186 of 1280

फाड़-फाड़कर देख रहे हैं। काश, उनमें से एक भी मनुष्य मुझे इस तरह ढाढ़स बंधा पाता कि ‘जाओ बंधु, जाओ! तुम्हारे पीछे मैं और हम तुम्हारे व्रत को पूरा करके अपने इस हिंदुस्थान के ं ं ं ’ तो मेरी वह अरथी मेरे लिए फूलों की सेज बन जाती।


प्रकरण-5

कालेपानी का सागर

उस जलयान की सीढ़ी से चढ़ाकर मुझे सीधे उसके तलमंजिल पर ले जाया गया। उधर एक बड़ा पिंजरा बनाया गया था, जिसमें लोहे की मजबूत छडे़ं लगाई गई थी। इस जहाज का वह पिंजरा बहुत लंबा


186 of 2123