इतने में जमादार चिल्लाया, ‘‘ऐसा मत करो। यह कालापानी है, भाई! पहले खड़े रहो। फिर मैं कहूंगा ‘पानी लो।’ फिर पानी लेना, वह भी एक कटोरा। फिर मैं कहूंगा, ‘अंग मलो। हाथ से शरीर रगड़ों।’ मैं कहूं, ‘और पानी लो’ कि पुनः दो कटोरे पानी लेना और वापस लौटना। तीन कटोरों-तीन थालियों-में स्नान करना है।’’

उस मुसलमान पठान जमादार की आज्ञा सुनते ही मैं चैंक पड़ा। मैं क्षेत्रवासी होने के कारण नासिक-न्न्यंबक के संकल्प अनुशासन से स्नान करने का आदी था। मन-ही-मन हंसते हुए मैंने कहा, ‘यह भी इस तरह का एक संकल्प ही है। वह गोरे पानी का सकंल्प था, इसे बस कालेपानी का संकल्प कहा जाए।’ उस दढ़ियल दीक्षित ने यह संकल्प-कथन प्रारंभ किया। मैं स्नान करने लगा। इतने में आंखें लप से बंद हो गई। कुछ भी नहीं दिख रहा था और बहुत तेज जलन होने लगी क्या हुआ? संकल्प


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होकर शून्यवत् उसकी उस निकलती अरथी की ओर देखते रहते हैं- ठीक उसी दृष्टिकोण से वे मेरी ओर देख रहे थे। उनकी मुदा से यह भाव स्पष्ट परिलक्षित था कि मैं अब इस जगत् के लिए मर चुका- और यह भावना सत्य थी। सचमुच ही मुझे अरथी पर चढ़ाया जा रहा था। अंतर बस इतना ही था कि शव को अरथी पर चढ़ाते समय जो भावनाएं दर्शक मन को स्तंभित अथवा व्याकुल करके शवयात्रा की ओर खींचती है, वह शव उनका आकलन नहीं कर पाता। परंतु मैं सब कुछ का आकलन कर


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