मुझे अति प्रसन्नता हुई। परंतु क्या भिगोऊं? जमादार ने काह, ‘‘लंगोटी।’’ अब काम करते तथा स्नान करते समय नियम से लंगोटी पहननी पड़ेगी। मन तनिक झिझका, पुनः कहा, ‘अरे पगले, रामदास भी तो लंगोटी ही पहना करते थे न! सभी जानते हैं, तुम्हारे इन कपड़ों के भीतर क्या है। फिर किससे छिपा रहे हो?’ इसी विकार को मिल्टन ने भ्वदवनत कपेीवदवनतंइसम ( आॅनर डिसआॅनरेबल) कहा है। यूरोप में ऐसा एक धर्मपंथ था, जो कपड़े पहनना पाप समझता था, क्योंकि आदम और ईव दोनों निष्पाप अवस्था में नग्न ही रहते थे। इस पंथ के अनुयायी भी वैसे ही रहते थे। उन्हें ‘अॅडमाइट’ कहा जाता था। वर्तमान यूरोप में भी धर्मदृष्टि से न सही, शास्त्र दृष्टि से कई स्थानों पर स्त्री-पुरूषों की छोटी-छोटी बस्तियां हैं, जो ऐसे क्षेत्र में प्रस्थापित किए जाते हैं कि जिनमें स्त्री-पुरूषों के लिए मात्र सर्दी निवारणार्थ वस्त्र पहनना क्षमा


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थी ही। उसके साथ ही उस जलयान की सीढ़ी पर कडे़ पहरे में मुझे चढ़ाया गया। मैं ऊपर चढ़ ही रहा था कि उस समय जहाज में सवार हुए यात्री, नौकर-चाकर, अधिकारी तथा आस-पास की छोटी-छोटी नौकाओं में सवार होकर आए हुए दर्शक वह दृश्य देखने के लिए धक्कम-धक्का करने लगे और अंदमान के उस जहाज पर मुझे सवार होते हुए ऐसे देखने लगे जैसे हम किसी शव को अरथी पर चढ़ाते और ठीक तरह से बांधते हुए विस्मय और जिज्ञासापूर्वक देखते हैं।

उस ‘महाराजा’ जलयान पर किसी बंदी का, जिसे आजन्म कारावास हो गया है,


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