हुई रस्सी खोलकर उसे कूटना-यह है हमारा पिश्टपेशण। यदि वह महान पिश्टपेशण महत्तवपूर्ण हो, कुछ असहमति रखता हो, यदि उसमें जीवन निरर्थक न हो, तो यह भी एक छोटा सा पिश्टपेशण कर्तव्य ही है, क्योंकि उस महान् पिश्टपेशण का यह भी एक अपरिहार्य अंग है। कारण वह घट रह है।

मैं जटाओं को कूटने लगा। हवलदार और वह बंदी यह देखने वहीं खड़े रहे कि मैं यह काम कर सकता हूं या नहीं, और मेरा मन बहलाने के लिए वे इधर उधर की गप्पें हांकने लगे-


‘‘महाराज, आपको यह ज्ञात नहीं होगा, जब तिलक¹ और आगरकर को दंड हुआ था जब उन्हें इसी कोठरी में रखा गया था। वे जब आपस में बहस करते तब जोर जोर से बोलने लगते। तब कभी कभी उन्हें चेतावनी देनी पड़ती कि धीरे बोलो।’’

’’पर वे आपकी बात सुनते थे या उलटे आप पर ही तनिक झुंझलाते, पर फिर


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बंद हो गया। भोजन परोसते हुए वे लोग आगे निकल गए। सुपरिटेंडेट आया और नियमानुसार परंतु सहानुभूति शब्दों में मुझसे बोला,’’आगे से आपको बंदी के कपड़े तथा अन्न मिलेगा। आपका पचास वर्ष का दंड आज से लागू हो गया है।’’

मैं उठा, अपने घरेलू कपड़े उतार दिए, बंदी के कपड़े ले लिये और पहनने लगा। मन कांप गया। ये वस्त्र-बंदी के वस्त्र, जो आज श्शरीर पर चढ़ रहे हैं- अब फिर कभी उतरनेवाले नहीं है। इन्हीं कपड़ों में मेरी अरथी निकलेगी। धुंधले से विचार ं ं ं ं ं


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