किंचित छुटकारा मिलते ही मैंने मुड़कर देखा तो एक मोटा-ताजा ह्नष्ट-पुष्ट गोरा अधिकारी हाथ में मोटा सा सोटा पकड़े मेरी ओर घूर रहा था। तो ये ही बारी साहब थे! उन्होंने हेतुपूर्वक अपने आगमन की बात मेरे कानों में डाली और अब वे नित्य के अनुभव के अनुसार इस अपेक्षा के साथ यहां आए थे कि यह बेचारा सहमी-सहमी नजरों से उनकी राह की ओर देखता होगा, परंतु उसी समय मेरा मन उपर्युक्त विजयी विचारों में मग्न था, अतः मुझे पता ही नहीं चला कि वे कब आ गए। उस कालावधि में उन्हें मेरी ओर देखते रहने की इच्छा हुई होगी। इस तरह मेरा गुपचुप निरीक्षण करते जैसे ही मेरी दृष्टि उनपर पड़ी वैसे ही वे मेरी ओर देखी-अनदेखी करते हुए उस सार्जेंट को आदेश देने लगे, ‘‘स्मंअम ीपउए ीम पे दवज ं जपहमतण्’’ (छोड़ दो इसे, वह कोई बाघ नहीं है।) उसके बाद मेरी ओर उस मोटे सोटे को लक्ष्य
तत्कालीन उपाध्यक्ष श्री अय्यर¹ -हिदंुस्थान में आए थे। इनकी असमय मृत्यु से इस वर्ष समूचा आर्यावर्त विह्मल हो रहा था। मैं इस बात से सचमुच अनभिज्ञ था कि वे हिंदुस्थान आए हुए हैं वे यूरोप से नाना वेशों और विधियों तथा उद्देश्य से यात्रा करते, सिर पर अति गंभीर आरोपों के वाॅरेंट लिए हिंदुस्थान की सीमाओं पर कड़ी गुप्तचर व्यवस्था के बावजुद हिंदुस्थान में पांडिचेरी में आ धमके थे। अंदमान में सात-आठ वर्ष गुजारने के बाद सीक्रेट रिपोर्ट पढ़कर मुझे ज्ञात हुआ कि पुलिस अधिकारियों की यह कल्पना