करने के लिए मैं झट से तैयार हो गया। मुझे घाट से निकलकर एक चढ़ाई पर चढ़ने का आदेश दिया गया। पर बेड़ियों से जकड़े हुए नंगे पैरों के कारण चढ़ने में विलंब होने लगा। सिपाही से कहा, ‘चलने दो उसे, जल्दी क्यों मचा रहे हो?’’ चढ़ते समय मेरे मन में एक ही विचार मंडरा रहा था,‘ सागर से यह राह चलकर मैं ऊपर चढ़ रहा हूं जो अंदमान जाती हैं अंदमान से वापस भारत लौटने के लिए इसी मार्ग से मैं इस जन्म में पुनः सागर की ओर आ भी सकूंगा?’
थोड़ी ही देर में चढ़ाई समाप्त हो गई और सिल्वर जेल का द्वार आ गया। लोहे की चुलों से दाढ़ कड़कड़ाने लगी। फिर उस कारागृह ने अपना जबड़ा खोला और मेरे भीतर घुसने के बाद वह जबड़ा जो बंद हुआ तो पुनः ग्यारह वर्ष बाद ही खुला।
बारी साहब आता है
छरवाजे के भीतर पैर रखते ही दो गोरे सार्जेटों ने मुझे दोनों से पकड़कर
समय मुक्त होंगे।’’ मैंने कहा, ‘‘ आपकी शुभकामना के लिए आभारी हूं। परंतु हमारे घाव इतने हरे हैं कि इतने शीघ्र कैसे भरेंगे? इस तरह की आशा पर निर्भर रहना मूर्खता ही होगी।’’ उन्होंने इतने आश्वस्त स्वर में कहा, जैसे कि वह जताना चाहते थे कि अधिकारी होने के नाते वे कुछ विशेष जानते हैं, ‘‘मुझपर विश्वास रखो। आप अवश्य मुक्त होंगे। अच्छा, आपसे विदा लेता हूं। आपके धीरोदात्त आचरण की अमिट छाप (ज्ीपे लवनत कपहदपपिमक बवनतंहम) मेरे मन पर अंकित हो