निकट ही खड़ा था। प्रत्येक हिंदू भारतीय पुलिस सिपाही तथा सैनिक की यही धारणा हो जाती है कि अंगे्रजों के सामने भारतीय राजनीतिक बंदियों के साथ जितना अधिक उद्दंडातापूर्वक व्यवहार करें
उतना ही अपनी पदोन्नति के लिए लाभदायक सिद्व होगा। अंदमान में होनेवाले अपमान का यह कहफ वाक्य सूत उवाच ही था। उठ गया, अपना बिस्तर सिर पर उठाया, हाथ में थालीपाट थामा, पैरों की भारी बेड़ियां कमर से ठीक-ठीक कस लीं और खड़ा रहा। किसी उच्च महान् विचारों की चोटी से अचानक किसी विवश प्रतिकूल तथा रूखे विचारों के गढ़े में ढकेला जाए तो मन भी घायल होता है, जैसे कि अचानक ऊंचाई से नीचे गिरने पर शरीर हताहत होता है, तथापि अपनी कल्पना तरंगों में दृष्टिगोचर हुई भावी भारत की बलशाली नौसेना को देख भविष्य में स्वाधीन होनेवाले भारत के कठोर एवं विवश वर्तमान के उस ‘चलो, उठाओ बिस्तर का सामना
मुझे एक तरफ सभी बंदियों से अलग करके पहरे में रखा गया। गाड़ी के साथ एक यूरोपियन अधिकारी बड़ी दूर से आया था। हो सकता है, वह रेल का अधिकारी हो या पुलिस का । वह हर दो-तीन स्टेशनों के प्श्चात् उन आधिकारियों में, जो मेरी निगरानी के लिए नियुक्त किए गए थे, किसी एक से कुछ बात करके मुझे देखकर वापस लौटता। संभवतः अब वह मुझे छोड़कर वापस लौट रहा हो। मेरे पास आकर वह बात करने लगा, उसका गला रूंधा हुआ था, ‘‘ळववक इलमए थ्तपमदक! ( अलविदा मित्र!) मुझे लगता है, आप प्रभु कृपा से दिसंबर में राज्यारोहण के