सामुदिक आक्रमण बिल्कुल घर के द्वार पर आकर बंबई, गोवा को खटखटाने लगे। उन्हें दूर रखकर रोकने के लिए कोई भी उपाय हिंदुस्थान की तत्कालीन देशी सत्ता नहीं कर सकी। अब भविष्य में तो यह भूल सुधार कर पश्चिम की ओर मालदीव, दक्षिण की ओर सिंहल द्वीप, पूरब की ओर अंदमान निकोबार द्वीपपुंज- इन सभी स्ािलों को बलशाली सामुद्रिक सैन्य शिविर तथा सागरीय दुर्ग का स्वरूप देना चाहिए।¹ आज केवल राजनीतिक संयोगवश सिंगापुर भारतीय सागर की नाक है। अंदमान प्राकृतिक चैकी है, क्योंकि अंदमान सिंहलद्वीप की तरह भारत का ही एक प्राकृतिक तथा सांस्कृतिक अंश है।
चलो, उठाओ बिस्तरा!
भावी भारत के बलशाली युद्वपोतों का बेड़ा अंदमान के प्रांगण में समुद्री दुर्ग के आगे पहरा देता हुआ मेरी कल्पना तरंग में लहराने ही लगा था कि एक सिपाही बड़ी उद्दंडतापूर्वक दहाड़ा,‘‘चलो, उठाओ बिस्तरा!’’ क्यांेकि एक यूरोपियन अधिकारी
को पार करती वह रेलगाड़ी किसी हड़काई हुई शेरनी की तरह मुझे मुहं में दबाए भागती जा रही थी। हाय-हाय! जितनी तीव्र गति के साथ वह मुझे अपनी मातृभूमि से कालेपानी की ओर खींचती हुई ले जा रही है उतनी ही तीव्र गति से वह कालेपानी से अपनी मातृभूमि पर मुझे कब लाएगी? कभी लाएगी भ्ज्ञी कि नहीं? कैसे लाएगी? यह आशा करना एक मानसिक आश्चर्य ही है। साइबेरिया में भी‘रूस! हाय मेरा रूस’ करते-करते मेरे भी प्राण पखेरू उड़ जाएंगे।
मद्रास आ गया। लेल से उतरते ही