अंदमान-निकोबार का यह पूर्ववर्ती द्वीपपुंज हिंदुस्थान के पूर्व में सागर का द्वार ही है। यदि यह द्वीप हिंदुस्थान के अधिकार में न हो और यदि उसका परकोटा तथा युद्वजन्य शक्ति दुर्बल हो तो पूरब की ओर से होनेवाला कोई भी समुद्री हमला कलकत्ता तक जा पहुंचेगा, परंतु यदि अंदमान का द्वीपपुंज हिंदुस्थान की सत्ता के नीचे रहेगा तो उसे हवाई एवं सागरीय थाने की योग्यता प्राप्त हो जाएगी और प्राचीर दृढ़ की जाएगी, उधर भारतीय नौसेना का एक बलशाली बेड़ा सतत पहरा देगा और पूर्ववर्ती विदेशी शत्रु के किसी भी आक्रमण का पहला प्रतिकार अंदमान के आंगन में ही किया जा सकेगा। अंदमान की बस्ती तथा सद्यः संस्कृति-सबकुछ भारतीय होने के कारण उस द्वीपपुंज का भारत का ही एक राजनीतिक विभाग होना न्यायोचित है। पश्चिमी सागर तट पर लक्षदीव-मालदीव जैसे छोटे-छोटे द्वीप भी हिंदुस्थानी राज्यशासन के हाथ से जब निकल गए तब यूरोपीय
छअपटाहट उतनी ही असहनीय थी जितनी अंतःकरण स्थिति ऊष्मा की। इस स्थिति में वह रेल मोगलाई मैदान में से होती मद्रास चली।
जब मन अधिक टूटता तो रूस से साइबेरिया जात राजनीतिक बंदियों की टोलियांे की यात्रा में जो दुर्गध बनी थी, उसका स्मरण करके मैं अपने मन को समझाता, ‘अरे, अभी भोगा ही क्या है तमने? यह कोई कहने की बात थोडे़ ही है? जो करेगा सो भरेगा। जो भरेगा सो करेगा।’
गांव के पीछे गांव, नगरों के पीछे नगर छोड़ती हुई, वन-उपवन, पर्वत, नदी-नालों