जगत् का पिश्टपेशण
हूं-चलो, करो इसका सामना। बस, नारियल की जटाएं ही तो कूटनी हैं न! हां रे, पागल मनुआ! भला इसमें ओछापन कैसा? इससे क्या जीवन व्यर्थ जाता है? भई, जीवन स्वयं ही क पिश्टपेशण है। पंचमहाभतों को निचोड़, बटकर जीवन की यह रस्सी बटनी है, बार-बार तंतुओं को लंबा करते रहना और अंत में मृत्यु के मोगरे से कूटकर पुनः जटाएं बनाकर पंचमहाभूतों के ढेर में उन्हें मिला देना।
प्रातः के पश्चात् संध्या, संध्या के पश्चात् पुनः सवेरा-सभी पिश्टपेशण । वनस्पति खा-खाकर जीना, जीते जीते मर जाना, मरते ही उस अस्थि-मांस को वनस्पति खा जाए-सभी पिश्टपेशण। तेजामेधा की सूर्यमाला, सूर्यमाला की पृथ्वी, इस धरा के किसी पुच्छल तारे से टकराने भर की देरी है कि पुनः तेजोमेध-सभी निरर्थक! डसी प्रकार उसी का और उसी के एक आवश्यक एवं अपरिहार्य अटल हिस्से के रूप में बनी-बनाई बंधी
करने जाना पड़े, कहा नहीं जा सकता। सदन्न कभी मिलेगा, कभी नहीं। हां परंतु कदन्न तो सदैव साथ होगा। उससे मित्रता चिरकाल तक उपयोगी होगी।’’ मैंने हंसते हुए कहा।
अधिकारी ने उतावलेपन से कहा, ’’नहीं-नहीं, ऐसा नहीं होगा। आप फ्रांस लौट जाएंगे, ऐसा आदेश भी आ चुका है, ऐसा मैंने सुना है। आप बंदियों में काम करेंगे? राव साहब, ईश्वर ऐसा कभी नहीं करेगा।’’
इतने में एक सिपाही भागता हुुआ आया और बोला,’’हवलदारजी, साहब आता है।’’ धड़ाम से दरवाजा