एक प्रकार से वह द्वीप अन्य द्वीपों की तुलना में इतना नन्हा सा, सुघड़ तथा सुशोभित था कि पल भर के लिए बेड़ियों में जकड़े मन का भी मनोरंजन हो जाता था। दूसरी ओर अंदमान के सागर तट के निकट सुदूर तथा सुव्यवस्थित ढंग से लगाई हुई नारियल वृक्ष की श्रेणियां झूम रही थी। दूर-दूर तक आम, सुपारी तथा पीपल वृक्ष के पुंज दिखाई दे रहे थे। निकट घाट पर मनुष्यों के झुंड-के-झुंड चहक रहे थे। उसके ऊपर ही ऊंचाई के सिरे पर नारियल के झूमते हुए छत्र के नीचे एक वृत्ताकार प्राचीर के भीतर एक भव्य भवन दिखाई दिया। कितना शांत उसके इर्दगिर्द नारियल, सुपारी तथा केले के वन चंॅवर ठुला रहे थे, छत्र पकड़कर खड़े थे। लगा जैसे यह किसी संपन्न तथा शांतिप्रिय गृहस्थ की कोठी हो अथवा किसी पादरी का आश्रम। हमने पूछा,‘‘वह भवन क्या है?’’ सिपाही ने कहा, ‘‘अरे, वही तो है बारी बाबा
ये गोरे लोग भी, जिन्होंने मुझे देखने के लिए वहां भीड़ लगाई थी, इतना निकट नहीं आ पाए कि मुझसे दो बातें करें। चार-पंाच गोरे आकर चले गए, परंतु मैंने स्वयं पहल करके किसी का नाम नहीं पूछा। उनके संभाषण में प्रायः। आदरभाव और कम-से-कम शिष्टता तो
दिखाई देती थी। इक्का-दूक्का गोरा उद्दंड होता था। यदि इस तरह कोई आता तो वह मेरी मुद्रा भी वैसी ही पाता। आता और जाता, मैं भी उसे कुछ नहीं गिनता।
मोगलाई मैदान
प्रायः मेरे डिब्बे की खिड़कियां बंद रहती । डिब्बे