बंदियों को वर्षों तक बंद रखने की परिपाटी बन गई- इतनी कठोर कि जिसकी एकांत कोठरी में कराहने की प्रतिध्वनि एक बार हिंदुस्थान के तट तक भी सुनाई दे।
प्रकरण-7
अंदमान में
जलयान अंदमान के बंदरगाह में आकर खड़ ं ंखड़ ं ंखड़ करता हुआ पानी में लोहे का लंगर डालकर खड़ा हो गया।¹ धीरे-धीरे बड़ी-बड़ी नौकाओं का, जो बंदियों को ले जाती हैं, और अधिकारियों की मोटरबोटों का जमघट उस जलयान के चारों ओर लग गया। उतरने के लिए हमें जहाज पर काफी समय खड़े रहना पड़ा। उतनी देर में इधर-उधर दृष्टि दौड़ाकर उस भूमि का निरिक्षण किया जहां हमें आजीवन रहना था। पुराने बंदी जो साथ में थे और कुछ सिपाही, वे कुछ जानकारी दे देते। वह रासक्ष्ीप है। वहां अंदमान का चीफ कमिश्नर रहता हैं सागर में यह द्वीप इस तरह शेभायमान था जैसे झील में बनाया हुआ किसी अप्सरा का महल।
छूटा, मैंने कभी खुली खिड़कियो वाले डिब्बे में बैठकर यात्रा की ही नहीं। परंतु इस स्टैशन पर मेरे साथ आए हुए एक अधिकारी ने न जाने पहले से ही वहां के विदेशी लोगों से क्या सांठगांठ की थी, मेरे डिब्बे की खिड़कियां खोल दी गई। काफी गोरे लोग थोड़ी-थोड़ी दूरी पर खड़े थे। मैंने देखा, उनमें से कुछ लोगों ने उत्सुकता के आवेश में अपनी मेमों को कंधों पर उठाया हुआ था। एक ने मुझे संकेत किया, खिड़की के पास खड़े रहो। मैं खड़ा रहा तो ‘ज्ीमतमश्े ीमए जींज पे ैंअंतांत’ का हल्ला सुनाई दिया।