नहीं पढ़ाई जाती, शिक्षा का माध्यम अभी भी उर्दू रखा गया है। ये और इस तरह की अनेक बातों की ओर जो कोई संगठक वहां जाए तो


वहां के अधिकारियों का ध्यान आकर्षित कर उचित व्यवस्था करे।

अंदमान की समस्त स्थिति का विवरण और उसे सुधारने के उपायों का उल्लेख आगे यथास्थान आएगा, अतः अभी इस अत्यंत महत्तवपूर्ण प्रश्न की ओर गौर करने तक ही मैं अपनी बात को सीमित रखकर आगे बढू़ंगा।

अंगे्रजी नाम का हिंदीकरण

अंदमान स्थित प्रस्ततुत भूभागों के नाम प्रायः अंगे्रजी में रखे गए हैं। परंतु भारतीय उपनिवेशांतर्गत लोगों की बातचीत में उनके जो रूप हो गए हैं, वे हिंदी से इतनी सफाई के साथ मिलते-जुलते हैं कि यदि कोई विद्वान उनके रूपांतर करने की जिम्मेदारी ले भी लेता तो वह उसे साध्य नहीं होता। भारतीय लोगों की बातचीत में ‘शोअर पाॅइंट’ का ‘सुवरपेठ’ रूपांतर हो गया है। ‘इडाॅस पाॅइंट’


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के साथ कहीं ले जाया जाता तब-तब बंदियों में मेरे संबंध में बड़प्पन की धारणा होती,‘वह क्या, वह तो भैया, राजा है राजा! देखो उसे मोटर दी गई। वह हमारे साथ पैर घसीटते पैदल थोड़े ही आएगा!’ कोई कहता, ‘सरकार उससे डरती है। देखो, कैसे मोटरकार ला दी।’ मार्सेलिस के जहाज से भागने के प्रयासों के जो लाभ हुए उनमें से यह भी एक लाभ हुआ कि मोटर की खूब सैर हो गई और उससे बंदियों में मेरे संबंध में जो सकारण-अकारण आदरभाव था और जिसके लिए सरकारी अधिकारी डटकर प्रयत्नशील थे कि वह आदरभाव न बने, बढ़ता ही चला गया।


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