गई, परंतु वह बसाहत टूटते ही- कुछ अंश तक टूट ही गई- कौंसिल के सदस्यों को इसका संपूर्ण विस्मरण हो गया, यह ठीक नहीं। उधर आज लगभग दस हजार लोग रह रहे हैं, जो हमारे देश, धर्म तथा जाति के हैं। हमारे बांधवों की तीन-चार पीढ़ियों के जीवन की राख इस द्वीपपुंज में जमी है। उनके अथक परिश्रम से यह द्वीप ‘यः कश्चित्’ पदार्थ नहीं है, आर्थिक दृष्टि से भी उधर विपुल संपदा उत्पन्न हो सकती है। उधर चाय बागान, रबड़ की फसल, गन्ने, नारियल, सुपारी के बड़े-बड़े बागान संपन्नावस्था में लहलहा रहे हैं, तथापि आज भी उस भूमि का भरण-पोषण वैसे नहीं हुआ जैसे होना चाहिए। अभी तक पचास वर्षों में एक छोटे से हिस्से को ही कृषि योग्य बनाया गया है। जंगल की पैदावार भी दो बार हो सकती है। अतः आर्थिक दृष्टि से भी बंदियों की बसाहत बंद होने के बाद इस द्वीप की व्यवस्था कैसी रखी गई,
पैदल चले पंरतु मुझे उसमें सम्मिलित नहीं किया गया। भला ऐसा क्यों? मुझे चिंता होने लगी। इतने में एक मोटर आ गई। दो हट्टे-कट्टे गोरे अधिकारी बाहर निकले। मै। भीतर बैठ गया, फिर वे बै गए और मोटर बंद हो गई। न जाने कैसे पंरतु शहर और स्टेशन पर यह बात फैल गई थी कि मैं आज ही कालापानी प्रस्थान कर रहा हूं। जिस मार्ग से बंदी जाते हैं, उस मार्ग पर मेरा भी दर्शन होगा, इसी आस में लोग हर प्रकार से प्रयास करके छिप-छिपकर टापते जमे हुए थे, अतः मुझे