’’राव साहब, चिंता मत करो। ईश्वर आपके ये दिन भी पार करेगा। आप पर पड़े संकट का भगवान् साक्षी है। मेरे परिवार के लोगों की भी आखें भर आई। परंतु मैंने गर्व से सभी को आश्वस्त किया कि इस संकट में भी वे नहीं डगमगाएंगे। फिर यह क्या। आप चिंता मत कीजिए।’’
उसके इस सद्भावनापूर्वक समझाने का परिणाम एकदम विपरीत हुआ। चिंता करने लायक कुछ घटित हुआ है, इसका मुझे स्पश्ट स्मरण हो गया। मन में एक चुभन सी हुई। मैंने पूछा, ’’यह बोझा किसलिए?’’ हवलदार ने हंसने की चेश्टा करते हुए कहा,’’ कुछ नहीं, बस यूं ही। कानूनी तौर पर कुछ-न-कुछ काम तो देना ही है। आपसे जितना बने कीजिए,उसकी कोई चिंता नहीं है।’’
उसने उस बोझे को नीचे उतारा। उसे खोला और उसके टुकड़े टुकड़े किए। फिर मुझे दिखाया कि किस किस तरह उसे ठोक-धुनकर उसकी रस्सी बनाई जाती है। तो फिर यह है-सश्रम कारावास।
तभी वे लोग आ गए, जिनके आने की आवाज आई थी। अधिकारी ने द्वार खोलकर मुझे भोजन परोसवाया। हेग का निर्णय आने तक मुझे बंदियों का भोजन या वेश नहीं दिया गया था; क्योंकि कदाचित् तब तक सरकारी आदेश नहीं आया होगा।
भोजन करते समय मैंने हेतुपूर्वक ही अच्छे पदार्थ नहीं खाए तो आधिकारी ने पूछा, ’’क्यों, राव साहब, आज खाते क्यों नहीं?’’
’’खा तो रहा हूं, परंतु वही व्यंजन खा रहा हूं जो सभी बंदियों को मिलते हैं।
कौन जाने, कल उन्हीं बंदियों के साथ मुझे भी काम