आॅंचल में बांधकर भी इस महत्तवपूर्ण बात पर विचार करने के लिए हम यहीं पर चार शब्द लिखना आवश्यक समझते हैं।
टंदमान में कुछ अंशों में बंदियों की टोलियों को भेजना बंद होने के बाद अधिकारियों ने निश्चय किया कि तत्रस्थ भूभाग का बंटवारा करके उन हिस्सों तथा नारियल एवं सुपारियों के उन हजारों बागानों को, जो सरकारी अधिकार में हैं, ग्राहकों को बेचकर वह सारी संपत्तिा व्यक्तिगत कर दी जाए। उसके अनुसार सैकड़ों एकड़ भूमि और वृक्ष अत्यल्प मूल्य पर बेचने के लिए समूह बनाए गए। इन समूहों की बिक्री की योजना के बारे में हिंदुस्थान के व्यापारी पूरी तरह से अनभिज्ञ थे, और ऐसे हिंदू व्यापारी भी इने-गिने ही थे जो अंदमान में उन समूहों को खरीद सकते थे। अतः स्पष्ट है, उनमें से प्रायः सारे समूह तत्रस्थ यूरोपियन तथा एंग्लो-इंडियन लोगों के हाथों ही लग रहे हैं। जिन थोडे़ से भारतीय व्यापारियों अथवा सहयोग
पूज्य है, मुझसे भी अधिक यंत्रनाएं झेलते हुए मुझे देखना पड़ता, सुनना पड़ता तो उस समय मेरी सहनशक्ति ऐसी भरभराती जैसे तूफान में
कोई प्रचंड वटवृक्ष कड़कड़ करता भरभराकर धाराशायी हो जाता है। मेरा कलेजा छलनी हो जाता।
एक विश्वासी अधिकारी से पूछा ‘‘यहां उन्हें कोई कष्ट तो नहीं दिया गया था?’’ उसने कहा, ‘‘वैसे तो नहीं हुआ, पर आपके अभियोगी (अभियोग में जो सह अभियुक्त होते हैं, उन्हें कारागृह में ‘को-एक्यूज्ड’ कहा जाता है) कहा करते।’’ उनका यह आश्वासन