हो रहा है कि अपने धर्म, जाति तथा राष्ट्र के सहÛों वंशज और अशंज अंदमान में बसे हुए हैं। उन भारतीय उपनिवेशियों का अपने प्रेम, आत्मीयता तथा कर्तव्य पर उतना ही अधिकार है जितना भारत के किसी भी एक राज्य का। यह बात भारतीय दिलों में अभी भले ही धुंधली सी हो, परंतु आने अवश्य लगी है।


पोर्ट ब्लेअर

‘पोर्ट ब्लेअर’ इस उपनिवेश का प्रमुख बंदरगाह और द्वीप है। अंदमान में भारतीय और ब्रह्मी लोगों के बंदियों का उपनिवेश होने से इन साठ-सत्तर वर्षों में ही वहां का जनसमूह भारतीय हो गया है। परंतु निकोबर में ब्रह्मी और मलाया संस्कृति तथा समाज से हमेशा के लिए वंचित हो गया है। आजकल अंदमान में भी कुछ हद तक दंडितों को भेजना बंद होने के कारण हमें यह आशंका हो रही है कि उधर भी भारतीय बस्ती समाप्ति की ओर लगती है और इसीलिए इस विषय से संबंधित पूर्वापर के दोषों को


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वह देख लेगा। यदि यह कहते होंगे तो अब मुझे भी इसी आहत होते देखकर उन्हें कैसा प्रतीत होगा? उन्हें कितना आघात पहुंचेगा? इससे अच्छा है, यदि उनसे मेरी प्रत्यक्ष भेंट न हो और मुझे भिन्न-भिन्न वार्डों में रखा जाए।

मेरे विचार से यदि मुझ अकेले को ही दंड भुगतना पड़ता तो मेरे मन को उन वेदनाओं का, जो मैंने भुगती है, पचासवां हिस्सा ही भोगना नहीं पड़ता। परंतु एक तो मैं अपनी वेदनाएं सहता था और उसी समय यदि मेरी आंखों के सामने मेरे अग्रज को भी, जो मुझे भगवान् सदृश


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