अंदमान के लिए ही रखाना किया गया था। हमें इस बात का पता चल ही गया था कि उनमें से एक-दो हमारे जाने के बाद आगे-पीछे मुक्त हो चुके थे। बंबई के हिंदु-मुस्लिम दंगा-फसादों में दंड प्राप्त कुछ हिंदू उधर ही थे। मणिपुर की राज्यक्रांति में हिस्सा लेनेवालों को भी उधर ही भेजा गया था। उनमें से उनके राजवंश के लोगों को एक सीमित भूखंड पर काफी हद तक स्वतंत्र रूप से घर बसाकर रहने की अनुमति दी जाती । ठेठ बंदियों जैसे व्यवहार से उन्हें तंग नहीं किया गया था। इस प्रकार अंदमान में राजनीतिक अथवा सार्वजनिक आंदोलन में दंड प्राप्त सैकड़ों राजनीतिक दंडित प्राचीन काल से कष्टमय दिन बिता रहे हैं, तथापि उनके कष्टों अथवा अंदमान की कहानी हिंदुस्थान के ह्नदयपटल पर अंकित होने का संयोग तब जुड़ नहीं सका। अर्वाचीन क्राांतिकारियों के निर्वासन से यह संयोग बना और भारतीय दिलों को अब इस बात का एहसास
तथा मानसिक आघात सहती हुई खड़ी थी, जैसे एक बार बहका हुआ हठी गजराज अपने गंडस्थल पर तीक्ष्ण-से-तीक्ष्ण आघातों को ‘उफ’ तक न करते हुए सहता है और अडिऋयल बना अचल खड़ा रहता है। इस कोठरी में वह वीर पुरूष सलाखों के पास उसी तरह हाथ मलता हुआ खड़ा रहा होगा जैसे पक्षीराज गरूड़ पिंजरे के पास झुंझलाता, झल्लाता हुआ रहता है। मेरी चिंता तो नहीं करते होंगे? या मन में यह तो नहीं कहते होंगे- क्या हुआ मैं चला गया तो? वह तो पीछे है न? फिर चिंता काहे की?