उपनिवेश प्रस्थापित करने का प्रयास किया तब अंदमान की जलवायू नगरवासियों के स्वास्थ्य के लिए बहुत हानिकारक थी। जो लोग उधर प्रस्थापित किए गए, उनमें से एक भी मनुष्य अधिक समय जीवित नहीं रह सका। उए ब्लेअर साहब के नाम से ही अंदमान का वर्तमान बंदरगाह -पोर्ट ब्लेअर’ के नाम से जाना जाता है। आगे सन् 1857 -58 के स्वतंत्रता संग्राम में जो हजारों सैनिक पराभूत होकर द्वीपांतर के भयानक दंड के शिकार बने, उन्हें इसी अंदमान में लाया गया। तभी से इस उपनिवेश काा सुसंबद्व श्रीगणेश हुआ। जब हम अंदमान गए थे तब सन् 1957 की राज्यक्रांति के निर्वासित शरणार्थियों से अंदमानी उपनिवेश का श्रीगणेश होता है- और यह कैसा संयोग ळ कि पचास वर्ष प्श्चात् सन् 1907 - 8 की राज्यक्रांति के नेताओं के निर्वासन से उसका अंत होता है।
वासुदेव बलवंत के राज्यक्रांति कार्य में भाग लेने वाले साथयों को भी
नया था, कुछ नहीं जानता था। एक पुराने सिपाही ने थोड़ी सी खोजबीन करते हुए कहा,‘‘उन्हें इसी कोठरी में बंद किया गया था, जहां आज मुझे रखा गया है।’’ वह सिपाही चला गया। मेरी आंखों के सामने मेरे ज्येष्ठ बंधु की मूर्ति खड़ी हो गई । उनके अभियोग के समय मेरे साथ जो लोगा थे, उनसे मुझे ज्ञात हो गया था कि जेल में उन्हें कड़ी यंत्रनाएं सहनी पड़ी। मुझे उनकी यंत्रनाएं भी दिखाई देने लगी। उनकी वह देह मुझे दिखाई देने लगी, जो यातनाएं से व्याकुल प्राण होने पर उन कष्टों के शारीरिक