निकलते ही हर कोई अपना-अपना तीर-कमान संभालता हुआ शिकार के लिए निकल पड़ता है। महिलाएं भी मच्छीमारी अथवा अन्य छोटे-मोटे शिकार के लिए निकल पड़ती है। उनकी टोलियां एक साथ एक छत के नीचे रहती हैं। आखेट में जो शिकार मिलता है उसमें सभी की साझेदारी। जंगली शहद, फल हर कोई अपना-अपना ग्रहण करता है। दिन भर भटककर रात में आग जलाकर उस पर वे शिकार लटकाते हैं। पहला शिकार भुनते ही उसे फाड़कर सभी जन एक साथ बैठकर खाते हैं। उसके पश्चात् कभी-कभी नर-नारी मिश्रित कोई नृत्य होने के उपरांत नर-नारियों के जोड़े अथवा सभी मिलकर उस आग के इर्दगिर्द वृत्ताकार नग्नावस्था में सो जाते हैं।
कुछ भगोड़े भारतीय बंदियों ने उन्हें खेती की परिकल्पना समझाने के लिए शाक-भाजी बनाकर दिखाई, तब उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ। मनुष्य की मृत्यु के पश्चात् वे शव को कुछ दिन के लिए
कुशाग्र बुद्वि द्वारा छिन्न-विछिन्न करता है अथवा इसके विपरीत उनके स्पष्ट गोचर अपराधों को अपनी बुद्वि की ढाल के नीचे छिपाकर उन्हें निर्दोष-बरी जो करा देता है। उनका इस प्राणी से डरना स्वाभाविक है। उससे हाथ मिलाने के लिए, उससे मित्रता करने के लिए वे स्वाभाविक रूप से प्रयास करते हैं। प्राचीनकाल में बादशाह और बीरबल की सुरस कथाएं दूर-दूर तक फेली हैं। भले ही मेरी ‘बालिस्टरी’ का मेरे लिए कोई उपयोग न हुआ हो, तथापि इतना उपयोग तो यहां अवश्य हो गया। कितना ही बड़ा बदमाश क्यों न हो, मेरे सामने झट से नम्र बन जाता ।