जावरे आज भी नरमांस भक्षक हैं। यूरोपियन साहसी यात्रियों ने उनके नरमांस भक्षक होने के बावजुद इन लोागों में घुसपैठ करके उनसे मित्रता की और उनके रहन-सहन, उनके रीति-रिवाजों और भाषा की मनोरंजक जानकारी संकलित की। अदंमान में दंडितों को भी जावरों की नरमांस लालसा का शिकार बनने की जगह उनके आतिथ्यपूर्वक भोजन का स्वाद उठाते हुए और उसके पश्चात् वहां से सही-सलामत वापस लौटते हुए हमने देखा है। उनके वर्णनों से इस तरह अनुमान लगाया जा सकता है कि जावरा सहसा शरणागत की जान नहीं लेते। पंरतु अंग्रेज सरकार के अधिकारियों को ही नहीं अपितु अन्य अवन्य मनुष्य को भी, जो शहरी दिखाई देता है, वे अपना प्राकृतिक शत्रु समझते हैं और जंल से निकलकर उसे अकेला देखकर उसके प्राण ले लेते हैं। कभी-कभी उसके मांस को वे कच्चा ही और कभी-कभी आग पर भूनकर खाते हैं। दिन
संबंध में उनकी कोई विशेष भावना नहीं होती, भले ही वह अंगे्रजों का प्रधानमंत्री ही क्यों न हो। परंतु ‘बैरिस्टर’ कहते ही आदरमिश्रित आश्चर्य भाव से भृकुटियां तानकर उनके मुख से भी ‘अच्छा!’ निकल ही जाता है। इसका कारण भ्ज्ञी स्पष्ट है। चोरी, उचक्की, डाकेजनी, न्यायलय तथा कारागृह में उनका सारा जन्म व्यतीत होता है। उधर उनके मतानुसार सहज ही ‘बालिस्टर’ कर्तुमकर्तुमन्यथाकर्तुम् समर्थ एक अद्वितीय प्राणी प्रतीत होगा ही, क्यांेकि वह उनके अत्यंत कुशलतापूर्वक बुने हुए पापों के जाल अपनी