जैसे-तैसे उनका तात्कालिक रूप से पीछा करके फिर से उन्हें गहरे जंगलों में खदेड़ देना-बस! इससे अधिक उनका पीछा करने का झंझट सरकारी अधिकारी कभी मोल नहीं लेते। हिंदुस्थान में एक राज्य जीतना जितना सुलभ है, उतना इन जंगलांे के वन्य तथा शूर लोगों पर काबू पाना सुलभ नहीं, जो तीरों की ीयंकर बौदार करते हैं। फिलहाल यह समस्या इतनी आवश्यक न होने के कारण आज तक ये लोग जंगल की अपरिचित निबिड़ता में रहकर, जिस तरह उनके पूर्वज जी रहे थे, उसी सनातन मार्ग से आचरण करते हुए नंगधड़ंग अवस्था में सुअर का पीछा करते, कच्चा मांस खाते, भूत-प्रेतों को पूजते आनंदपूर्वक जीवन जी रहे हैं। उनकी इस रूढ़ि को कोई अशिष्ट कहकर तो देखें। उनमें से सनातन धर्माधिकारी सज्जन उसे जीते-जी फाड़कर उसकी बोटी-बोटी करके उसी के कच्चे मांस पर अपना उदर-भरण किए बिना नहीं छोड़ेगा।
नरमांस भक्षक
में जो गोबर से नहीं खेलता, वही अशिष्ट सिद्व होता है और समाज उसकी ओर उपहास तथा तिरस्कार बुद्वि से देखता है।
बालिस्टर की प्रतिष्ठा
उस रात मेरी भी अवस्था कुछ ऐसी ही हो जाती, परंतु सौभाग्यवश ‘बैरिस्टर’ और ‘बड़ा साहब’ के रूप में जिसे-तिस के मुंह में अपना बोलबाला था। बंदियों में और उनमें भी घुटे हुए बदमाश अपराधियों में, यदि किसी वर्ग के विषय में सहज आदरभाव तथा भय उत्पन्न होता है, तो वह ‘बैरिस्टर’ वर्ग के विषय में है। कवि, विद्वान, सात्तिवक जनों के