मेरे कारण दूसरों को कश्ट न हो, इसलिए तब मैं यथासंभव आंखे नीची करके टहलता था। इस व्यायाम के समय मुंह से योगसूत्र का पाठ करता और इसके पश्चात् उसके एक-एक सूत्र पर विचार करते हुए उसकी छानबीन करता। आज भी नित्य क्रमानुसार इसी तरह के विचारों में उलझा हुआ मैं व्यायाम कर रहा था। इतने में एक हवलदार ने-जिसे मेरे लिए ही नियुक्त किया गया था-बताया, ’’समय पूरा हो गया है, चलिए।’’ मैं सीढ़ियां चढ़ता ऊपर अपनी कोठरी में आ गया। परंतु जो विचार कर रहा था उसी में उलझाा होने से वैसे ही बैठा रहा। उस निमग्नता में काफी समय व्यतीत हुआ कि पुनः दरवाजा खड़का और हवलदार ने भीतर प्रवेश किया। उसके साथ एक बंदी था, जिसके सिर पर एक गठरी थी। सोचते-सोचते मेरा चित्त श्शांत हो गया और मैं पल भर के लिए उसी तरह आंखें खोले निश्चित बैठा रहा। इसे देख हवलदार ने कहा,


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बोले। ’’ ऐसा थोड़े ही है कि यह इस तरह के समाचार मुझे भयंकर नहीं लगते, परंतु पहले से ही समझ-बुझकर इस संकट का सामना करने के संकल्प से भरे होने के कारण हमारा मन कठोर हो गया है। यदि आप भी मेरी स्थिति में होते तो इसी विवेक के बल पर ऐसा ही धीरज रख पाते। आपकी सहायता के प्रति मैं आभारी हूं।’’

इतने में ही किसी के आने की आहट हुई। वह सज्जन झट से मेरी कोठरी के आगे से निकल दूसरी दिशा की ओर अपने काम से चलते बने। मैं अपनी कोठरी में पीछे सरककर खड़ा रहा। मन में श्शब्द गूंज रहे थे-’पचास वर्ष’।


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