तीरों की बौछार
इन जावरों के अतिरिक्त इधर एक और वन्य जाति पाई जाती है। परंतु उसका कद ऊंचा तथा वह इन जावरों से अधिक प्रगतिशील दिखाई देती है। कदाचित् यह जनजाति प्राचीन उपनिवेश के अवशिष्ट मानव से वन्य जातियों के संबंध से बनी हो। जावरा एक पत्नीक होते हैं। वे अन्य यंत्रों से भले ही अपरिचित हों, एक यंत्र से भली भांति परिचित होते हैं-वह है उनका पांच-छह फीट लंबा धनुष। उनका शरसंधान अचूक होता है। इस तीर-कमान के बलबूते ही उन्होंने अपनी स्वतंत्रता अक्षुण्ण रखी है। भले ही अब बंदूकों तथा हवाई जहाजों के सामने उसका निभना असंभव है, परंतु उनके धनुष के कारण ऐसे साधन होने के बावजूद अंगे्रज उन्हें सहजता से नहीं जीत सके। कई बार जंगलों से गुपचुप आगे बढ़कर सरकारी छावनियों, चैकियों अथवा
अकेले बंदियों पर छापामारी करके वे नौ-दौ-ग्यारह हो जाते, तथापि
तब समझो गंगा नहा गए, और इस तरह नाक में दम होने पर निढाल हो जाते। कर्तव्य-कर्म वही है कि जिसकी प्रशंसा जिस समाज में हम रहते हैं, उसका बहुजन समाज करता है। यह साधारण सहज भावना है। इस विधान का पोषक उदाहरण
इस चालान के संस्थागत अभिमान से कुछ परे ढूंढ़ना आवश्यक नहीं है। जिस समाज में बीभत्स विनोद कर्तव्य सिद्व होता है, उस समाज में वह व्यक्ति पापी तथा समाज-निंदित सिद्व होगा ही, जो इस तरह के विनोद में सम्मिलित नहीं होता। होली के त्योहार